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11 नवंबर 2018 को रांची (झारखंड) में पहली भारतीय आदिवासी आत्मकथा (1968-2018) के प्रकाशन के 50 साल पूरे होने एक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित होने जा रहा है. आप सब आमंत्रित हैं.

जंगल के पार: आदिवासी आत्म कथाकार

पहली आदिवासी आत्मकथा के 50 साल होने पर

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...राज्य सत्ता के दमन और कॉरपोरेट लूट के खिलाफ.घोषणा-पत्र देखें >

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हम न झुके हैं, न ही कभी झुकेंगे
आदिवासी/देशज समुदाय दो हजार सालों से युद्ध में हैं.

जोहार! देश के आदिवासी/देशज समुदाय कभी नहीं हारे, चाहे मिथक हो, इतिहास हो या कि वर्तमान. हमने घुटने कभी नहीं टेके. चाहे मिथक हो, इतिहास हो या कि वर्तमान. हुलगुलान जिंदाबाद!!

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